Monday, 19 August 2013

खून..... क्या है ये खून ?

खून..... क्या है ये खून ?


आज पेहली बार ये एहसास हुआ
कि अपना खून खुद से अलग हो तो क्या तकलीफ होती है

खून..... क्या है ये खून ?
वो जो शरीर मै बेहता है ?
या वो जो रीश्तोंके मुखौटे लेकर अपने आसपास रेहता है ?
वैसे खून का असली रंग क्या होता है ?
क्या होती है उसकी नियत?
क्या होते है उसके आदर्श?

गंदी नाली में बेहनेवाला खून क्या खून नही होता?
या वो होता है सिर्फ और सिर्फ गटर का पानी, जिसे चाहे कितना भी साफ करने कि कौशिश करो मगर वो साफ करने वालेके हि गिरेबान को खराब करता है.

लेकीन फिर अमिरोंकि बस्ती में भी कहां साफ खून कि गारंटी है भई?
असंवेदनशीलता के गिलावे पे खाडी वो एक खोकली दिवार होती है.
जो ना कभी वास्तविकता पेहचानती है और न किसीकी सच्ची भूक.
पुराने, झुठे और खोकले आदर्शोनकी बडी दिवारे भी रेहती है यहां पर
जो कोई गरीब जिंदगी भर पार करने कि कौशिश करते करते अनंत काल कि यात्रा पार कब निकल जाता है किसीको पता भी नही चलता और न किसीको फर्क पडता है.   

उपेक्षित...

No comments:

Post a Comment